Government of Uttar Pradesh
Fisheries Detail Description

मत्स्य पालन का विस्तृत विवरण

  1. मत्स्य पालन हेतु उपयुक्त तालाब का चयन/निर्माण :-

    जिस प्रकार कृषि के लिए भूमि आवश्यक है उसी प्रकार मत्स्य पालन के लिए तालाब की आवश्यकता होती है। ग्रामीण अंचलों में विभिन्न आकार प्रकार के तालाब व पोखरें पर्याप्त संख्या में उपलब्ध होते हैं जो कि निजी, संस्थागत अथवा गांव सभाओं की सम्पत्ति होते हैं। इस प्रकार के जल संसाधन या तो निष्प्रयोज्य पड़े रहते हैं अथवा उनका उपयोग मिट्टी निकालने, सिंघाड़े की खेती करने, मवेशियों को पानी पिलाने, समीपवर्ती कृषि योग्य भूमि को सींचने आदि के लिए किया जाता है।

     

    मत्स्य पालन हेतु 0.2 हेक्टेयर से 5.0 हेक्टेयर तक के ऐसे तालाबों का चयन किया जाना चाहिए जिनमें वर्ष भर 8-9 माह पानी भरा रहे। तालाबों को सदाबहार रखने के लिए जल की आपूर्ति का साधन होना चाहिए। तालाब में वर्ष भर एक से दो मीटर पानी अवश्य बना रहे। तालाब ऐसे क्षेत्रों में चुने जायें जो बाढ़ से प्रभावित न होते हों तथा तालाब तक आसानी से पहुंचा जा सके। बन्धों का कटा फटा व ऊँचा होना, तल का असमान होना, पानी आने-जाने के रास्तों का न होना, दूसरे क्षेत्रों से अधिक पानी आने-जाने की सम्भावनाओं का बना रहना आदि कमियां स्वाभाविक रूप से तालाब में पायी जाती हैं जिन्हें सुधार कर दूर किया जा सकता है। तालाब को उचित आकार-प्रकार देने के लिए यदि कही पर टीले आदि हों तो उनकी मिट्टी निकाल का बन्धों पर डाल देनी चाहिए। कम गहराई वाले स्थान से मिट्टी निकालकर गहराई एक समान की जा सकती है। तालाब के बन्धें बाढ़ स्तर से ऊंचे रखने चाहिए। पानी के आने व निकास के रास्ते में जाली की व्यवस्था आवश्यक है ताकि पाली जाने वाली मछलियां बाहर न जा सकें और अवांछनीय मछलियां तालाब में न आ सके। तालाब का सुधार कार्य माह अप्रैल व मई तक अवश्य करा लेना चाहिए जिससे मत्स्य पालन करने हेतु समय मिल सके।p

    नये तालाब के निर्माण हेतु उपयुक्त स्थल का चयन विशेष रूप से आवश्यक है। तालाब निर्माण के लिए मिट्टी की जल धारण क्षमता व उर्वरकता को चयन का आधार माना जाना चाहिए। ऊसर व बंजर भूमि पर तालाब नहीं बनाना चाहिए। जिस मिट्टी में अम्लीयता व क्षारीयता अधिक हो उस पर भी तालाब निर्मित कराया जाना उचित नहीं होता है। इसके अतिरिक्त बलुई मिट्टी वाली भूमि में भी तालाब का निर्माण उचित नहीं होता है क्योंकि बलुई मिट्टी वाले तालाबों में पानी नहीं रूक पाता है। चिकनी मिट्टी वाली भूमि में तालाब का निर्माण सर्वथा उपयुक्त होता है। इस मिट्टी में जलधारण क्षमता अधिक होती है। मिट्टी की पी-एच 6.5-8.0, आर्गेनिक कार्बन 1 प्रतिशत तथा मिट्टी में रेत 40 प्रतिशत, सिल्ट 30 प्रतिशत व क्ले 30 प्रतिशत होना चाहिए। तालाब निर्माण के पूर्व मृदा परीक्षण मत्स्य विभाग की प्रयोगशालाओं अथवा अन्य प्रयोगशालाओं से अवश्य करा लेना चाहिए। तालाब के बंधे में दोनों ओर के ढलानों में आधार व ऊंचाई का अनुपात साधारणतया 2:1 या 1.5:1 होना उपयुक्त है। बंधे की ऊंचाई आरम्भ से ही वांछित ऊंचाई से अधिक रखनी चाहिए ताकि मिट्टी पीटने, अपने भार तथा वर्षा के कारण कुछ वर्षों तक बैठती रहे। बंध का कटना वनस्पतियों व घासों को लगाकर रोका जा सकता है। इसके लिए केले, पपीते आदि के पेड़ बंध के बाहरी ढलान पर लगाये जा सकते हैं। नये तालाब का निर्माण एक महत्वपूर्ण कार्य है तथा इस सम्बन्ध में मत्स्य विभाग के अधिकारियों का परामर्श लिया जाना चाहिए।

  2. मिट्टी पानी की जांच :-

    मछली की अधिक पैदावार के लिए तालाब की मिट्टी व पानी का उपयुक्त होना परम आवश्यक है। मण्डल स्तर पर मत्स्य विभाग की प्रयोगशालाओं द्वारा मत्स्य पालकों के तालाबों की मिट्टी पानी की नि:शुल्क जांच की जाती है तथा वैज्ञानिक विधि से मत्स्य पालन करने के लिए तकनीकी सलाह दी जाती है। वर्तमान में मत्स्य विभाग की 12 प्रयोगशालायें कार्यरत हैं। केन्द्रीय प्रयोगशाला मत्स्य निदेशालय, 7 फैजाबाद रोड, लखनऊ में स्थित है। शेष 11 प्रयोगशालाये फैजाबाद, गोरखपुर, वाराणसी, आजमगढ़, मिर्जापुर, इलाहाबाद, झांसी, आगरा, बरेली, मेरठ मण्डलों में उप निदेशक मत्स्य के अन्तर्गत तथा जौनपुर जनपद में गूजरताल मत्स्य प्रक्षेत्र पर कार्यरत हैं।

  3. तालाब प्रबन्ध व्यवस्था :-

    मत्स्य पालन प्रारम्भ करने से पूर्व यह अत्यधिक आवश्यक है कि मछली का बीज डालने के लिए तालाब पूर्ण रूप से उपयुक्त हो।

    (अ) अनावश्यक जलीय पौधों का उन्मूलन :-

    तालाब में आवश्यकता से अधिक जलीय पौधों का होना मछली की अच्छी उपज के लिए हानिकारक है। यह पौधे पानी का बहुत बड़ा भाग घेरे रहते हैं जिसमें मछली के घूमने-फिरने में असुविधा होती है। साथ ही यह सूर्य की किरणों को पानी के अन्दर पहुंचने में भी बाधा उत्पन्न करते हैं। परिणामस्वरूप मछली का प्राकृतिक भोजन उत्पन्न होना रूक जाता है और प्राकृतिक भोजन के अभाव में मछली की वृद्धि पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त यह पौधे मिट्टी में पाये जाने वाले रासायनिक पदार्थों का प्रचूषण करके अपनी बढ़ोत्तरी करते हैं और पानी की पौष्टिकता कम हो जाती है। मछली पकड़ने के लिए यदि जाल चलाया जाय तब भी यह पौधे रूकावट डालते हैं। सामान्यत: तालाबों में जलीय पौधे तीन प्रकार के होते हैं - एक पानी की सतह वाले जैसे जलकुम्भी, लेमना आदि, दूसरे जड़ जमाने वाले जैसे कमल इत्यादि और तीसरे जल में डूबे रहने वाले जैसे हाइड्रिला, नाजाज आदि। यदि तालाब में जलीय पौधों की मात्रा कम हो तो इन्हें जाल चलाकर या श्रमिक लगाकर जड़ से उखाड़कर निकाला जा सकता है। अधिक जलीय वनस्पति होने की दशा में रसायनों का प्रयोग जैसे 2-4 डी सोडियम लवण, टेफीसाइड, हैक्सामार तथा फरनेक्सान 8-10 कि०ग्रा० प्रति हे० जलक्षेत्र में प्रयोग करने से जलकुम्भी, कमल आदि नष्ट हो जाते हैं। रसायनों के प्रयोग के समय विशेष जानकारी मत्स्य विभाग के कार्यालयों से प्राप्त की जानी चाहिए। कुछ जलमग्न पौधे ग्रास कार्प मछली का प्रिय भोजन होते हैं अत: इनकी रोकथाम तालाब में ग्रासकार्प मछली पालकर की जा सकती है। उपयुक्त यही है कि अनावश्यक पौधों का उन्मूलन मानव-शक्ति से ही सुनिश्चित किया जाय।

    (ब) अवांछनीय मछलियों की सफाई :-

    पुराने तालाबों में बहुत से अनावश्यक जन्तु जैसे कछुआ, मेंढक, केकड़े और मछलियां जैसे सिंधरी, पुठिया, चेलवा आदि एवं भक्षक मछलियां उदाहरणार्थ पढ़िन, टैंगन, सौल, गिरई, सिंघी, मांगुर आदि पायी जाती हैं जो कि तालाब में उपलब्ध भोज्य पदार्थों को अपने भोजन के रूप में ग्रहण करती हैं। मांसाहारी मछलियां कार्प मछलियों के बच्चों को खा जाती है जिससे मत्स्य पालन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अत: इनकी सफाई नितान्त आवश्यक है। अवांछनीय मछलियों का निष्कासन बार-बार जाल चलाकर या पानी निकाल कर अथवा महुआ की खली के प्रयोग द्वारा किया जा सकता है। महुए की खली का प्रयोग एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के एक मीटर पानी की गहराई वाले तालाब में 25 कुंटल की दर से किया जाना चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप 6-8 घंटों में सारी मछलियां मर कर ऊपर आ जाती हैं जिन्हें जाल चलाकर एकत्र करके बाजार में बेचा जा सकता है। महुए की खली का प्रयोग तालाब के लिए दोहरा प्रभाव डालता है। विष के अलावा 15-20 दिन बाद यह खाद का भी कार्य करती है जिससे मछली के प्राकृतिक भोजन का उत्पादन होता है।

    (स) जलीय उत्पादकता हेतु चूने का प्रयोग :-

    पानी का हल्का क्षारीय होना म्त्स्य पालन के लिए लाभप्रद है। पानी अम्लीय अथवा अधिक क्षारीय नहीं होना चाहिए। चूना जल की क्षारीयता बढ़ाता है अथवा जल की अम्लीयता व क्षारीयता को संतुलित करता है। इसके अतिरिक्त चूना मछलियों को विभिन्न परोपजीवियों के प्रभाव से मुक्त रखता है और तालाब का पानी उपयुक्त बनाता है। एक हेक्टेयर के तालाब में 250 कि०ग्रा० चूने का प्रयोग मत्स्य बीज संचय से एक माह पूर्व किया जाना चाहिए।

    (द) गोबर की खाद का प्रयोग :-

    तालाब की तैयारी में गोबर की खाद की महत्वपूर्ण भूमिका है। इससे मछली का प्राकृतिक भोजन उत्पन्न होता है। गोबर की खाद, मत्स्य बीज संचय से 15-20 दिन पूर्व सामान्तया 10-20 टन प्रति हे० प्रति वर्ष 10 समान मासिक किश्तों में प्रयोग की जानी चाहिए। यदि तालाब की तैयारी में अवांछनीय मछलियों के निष्कासन के लिए महुआ की खली डाली गयी हो तो गोबर की खाद की पहली किश्त डालने की आवश्यकता नहीं है।

    (ध) रासायनिक खादों का प्रयोग :-

    सामान्यत: रासायनिक खादों में यूरिया 200 किलोग्राम, सिंगिल सुपर फास्फेट 250 कि०ग्रा० व म्यूरेट आफ पोटाश 40 कि०ग्रा० अर्थात कुल मिश्रण 490 कि०ग्रा० प्रति हे० प्रति वर्ष 10 समान मासिक किश्तों में प्रयोग किया जाना चाहिए। इस प्रकार 49 कि०ग्रा० प्रति हे० प्रति माह रासायनिक खादों के मिश्रण को गोबर की खाद के प्रयोग 15 दिन बाद तालाब में डाला जाना चाहिए। यदि तालाब के पानी का रंग गहरा हरा या गहरा नीला हो जाये तो उर्वरकों का प्रयोग तब तक बन्द कर देना चाहिए जब तक पानी का रंग उचित अवस्था में न आ जाये।

  4. मत्स्य बीज की आपूर्ति :-

    तालाब में ऐसी उत्तम मत्स्य प्रजातियों के शुद्ध बीज का संचय सुनिश्चित किया जाना चाहिए जो कि एक ही जलीय वातावरण में रहकर एक दूसरे को क्षति न पहुंचाते हुए तालाब की विभिन्न सतहों पर उपलब्ध भोजन का उपभोग करें तथा तीव्रगति से बढ़ें। भारतीय मेजर कार्प मछलियों में कतला, रोहू एवं नैन तथा विदेशी कार्प मछलियों में सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प एवं कामन कार्प का मिश्रित पालन विशेष लाभकारी होता है। उत्तम मत्स्य प्रजातियों का शुद्ध बीज, मत्स्य पालन की आधारभूत आवश्यकता है। उत्तर प्रदेश मत्स्य विकास निगम की हैचरियों तथा मत्स्य विभाग के प्रक्षेत्रों पर उत्पादित बीज की आपूर्ति मत्स्य पालकों को आक्सीजन पैकिंग में तालाब तक निर्धारित सरकारी दरों पर की जाती है। उत्तर प्रदेश को मत्स्य बीज उत्पादन के क्षेत्र में मांग के अनुसार आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य मत्स्य बीज उत्पादन के निजीकरण पर विशेष बल दिया जा रहा है तथा निजी क्षेत्र में 10 मिलियन क्षमता वाली एक मिनी मत्स्य बीज हैचरी की स्थापना के लिए रू० 8.00 लाख तक बैंक ऋण व इस पर 10 प्रतिशत शासकीय अनुदान की सुविधा अनुमन्य है। मत्स्य पालक निजी क्षेत्रों में स्थापित छोटे आकार की हैचरियों से भी शुद्ध बीज प्राप्त कर सकते हैं।

  5. मत्स्य बीज संचय व अंगुलिकाओं की देखभाल :-

    तालाब में ऐसी मत्स्य प्रजातियों का पालन किया जाना चाहिए जो एक पर्यावरण में साथ-साथ रह कर एक दूसरे को क्षति न पहुंचाते हुए प्रत्येक सतह पर उपलब्ध भोजन का उपयोग करते हुए तीव्रगति से बढ़ने वाली हों ताकि एक सीमित जलक्षेत्र से अधिक से अधिक मत्स्य उत्पादन सुनिश्चित हो सके। भारतीय मेजर कार्प मछलियों में कतला, रोहू, नैन तथा विदेशी कार्प मछलियों में सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प व कामन कार्प का मिश्रित पालन काफी लाभकारी होता है। तालाब में मत्स्य बीज संचय से पूर्व यह विशेष ध्यान देने योग्य है कि तैयारी पूर्ण हो गयी है और जैविक उत्पादन हो चुका है। मछली का प्राकृतिक भोजन जिसे प्लांक्टान कहते हैं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होना चाहिए। तालाब के 50 लीटर पानी में एक मि०ली० प्लांक्टान की उपलब्धता इस बात का द्योतक है कि मत्स्य बीज संचय किया जा सकता है। एक हे० जल क्षेत्र में 50 मि०मी० आकार से कम का 10,000 मत्स्य बीज तथा 50 मि०मी० से अधिक आकार की 5000 अंगुलिकाएं संचित की जानी चाहिए। यदि छह प्रकार की देशी व विदेशी कार्प मछलियों का मिश्रित पालन किया जा रहा हो तो कतला 20 प्रतिशत सिल्वर कार्प 10 प्रतिशत, रोहू 30 प्रतिशत, ग्रास कार्प 10 प्रतिशत, नैन 15 प्रतिशत व कामन कार्प 15 प्रतिशत का अनुपात उपयुक्त होता है। यदि सिल्वर कार्प व ग्रास कार्प मछलियों का पालन नहीं किया जा रहा है और 4 प्रकार की मछलियां पाली जा रही हैं तो संचय अनुपात कतला 40 प्रतिशत, रोहू 30 प्रतिशत, नैन 15 प्रतिशत व कामन कार्प 15 प्रतिशत होना लाभकारी होता है। यदि केवल भारतीय मेजर कार्प मछलियों का ही पालन किया जा रहा हो तो कतला 40 प्रतिशत, रोहू 30 प्रतिशत, नैन 30 प्रतिशत का अनुपात होना चाहिए। कामन कार्प मछली का बीज मार्च, अप्रैल व मई में तथा अन्य कार्प मछलियों का बीज जुलाई, अगस्त, सितम्बर में प्राप्त किया जा सकता है।

  6. मृदा एवं जल का विस्तृत विवरण

    मछली की अधिक पैदावार के लिए तालाब की मिट्टी व पानी का उपयुक्त होना परम आवश्यक है। ऐसी मिट्टी जिसमें सैण्ड 40 प्रतिशत तक, सिल्ट 30 प्रतिशत तथा क्ले 30 प्रतिशत हो एवं पी-एच 6.5 से 7.5 हो, मत्स्य पालन हेतु तालाब निर्माण के लिए उपयुक्त होती है। मिट्टी में सैण्ड का प्रतिशत अधिक होने पर तालाब में पानी रूकने की समस्या होती है। अधिक क्षारीय मृदा भी मत्स्य पालन हेतु उपयुक्त नहीं होती है। तालाब की मिट्टी में 50 मि०ग्रा० नाइट्रोजन तथा 6 मि०ग्रा० फास्फोरस प्रति 100 ग्राम मिट्टी एवं एक प्रतिशत आर्गेनिक कार्बन होना चाहिए। यदि उपलब्ध नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं आर्गेनिक कार्बन सामान्य से कम है तो निर्धारित मात्राओं में जैविक व रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग करते हुए तालाब को मत्स्य पालन हेतु उपयुक्त बनाया जा सकता है।

    तालाब के जल का रंग हल्का भूरा होना उपयुक्त होता है क्योंकि इस प्रकार के जल में मछली का प्राकृतिक भोजन प्लांक्टान उपलब्ध होता है। पानी हल्का क्षारीय होना उपयुक्त होता है। पानी की पी-एच 7.5 से 8.5 घुलित आक्सीजन 5 मि०ग्रा० प्रति लीटर, स्वतंत्र कार्बन डाइआक्साइड 0 से 0.5 मि०ग्रा० प्रति लीटर, सम्पूर्ण क्षरीयता 150-250 मि०ग्रा० प्रति लीटर, क्लोराइड्स 30-50 मि०ग्रा० प्रति लीटर तथा कुल कठोरता 100-180 मि०ग्रा० प्रति लीटर तक होनी चाहिए। मत्स्य पालकों के तालाबों की मिट्टी-पानी का नि:शुल्क परीक्षण मत्स्य विभाग की प्रयोगशालाओं द्वारा किया जाता है तथा वैज्ञानिक विधि से मत्स्य पाल करने हेतु तकनीकी सलाह दी जाती है। वर्तमान में मत्स्य विभाग की 12 प्रयोगशालायें कार्यरत हैं। केन्द्रीय प्रयोगशाला मत्स्य निदेशालय 7-फैजाबाद रोड, लखनऊ में स्थित है। शेष 11 प्रयोगशालायें फैजाबाद, गोरखपुर, वाराणसी, आजमगढ़, मिर्जापुर, इलाहाबाद, झाँसी, आगरा, बरेली, मेरठ मण्डलों में उप निदेशक मत्स्य के अन्तर्गत तथा जौनपुर जनपद में गूजरताल मत्स्य प्रक्षेत्र पर कार्यशील है।