Government of Uttar Pradesh
Fishery Seed Production (Activated Reproductive Method) from Artificial Means

कतला, रोहू और नैन मछलियों को भारतीय मेजर कार्प की संज्ञा दी गई है तथा तालाबों में इन्हीं मछलियों का पालन किया जाना लाभकारी होता है। इसका मूल कारण है कि यह मछलियों शाकाहारी प्रवृत्ति की होती हैं अर्थात् एक दूसरे का हानि नहीं पहुंचाती और साथ ही तीव्रगति से वृद्धि करती है। अर्न्तस्थलीय मत्स्य विकास के फलस्वरूप इन मछलियों के बीज की मांग निरंतर बढ़ती जा रही है।

भारतीय मेजर कार्प मछलिया यद्यपि तालाबों में प्रभावशाली वृद्धि करते हुए परिपक्वता ग्रहण करती हैं परन्तु सामान्य रूप से तालाबों में प्रजनन नहीं करतीं। परिणामस्वरूप इन मछलियों का बीज विगत कई वर्षों से नदियों से एकत्र किया जाता रहा है। नदियों में यह मछलियां प्राकृतिक रूप से प्रजनन करती हैं। समस्या इस बात की है कि इस प्रकार एकत्रित मत्स्य बीज अधिकतर वांछनीय और अवांछनीय मछलियों की प्रजातियों का मिश्रण होता है तथा इसमें अनावश्यक प्रजातियों की मात्रा का बाहुल्य स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त मत्स्य बीज की उपलब्धिता भी अनिश्चित रहती है।

उत्तम बीज की बढ़ती हुई मांग की पूर्ति हेतु देश मत्स्य वैज्ञानिकों ने उत्प्रेरित प्रजनन विधि द्वारा शुद्ध बीज प्राप्त करने के कृत्रिम साधन का अविष्कार किया। इसके माध्यम से मेजर कार्प मछलियां जो तालाबों में अंडे देने योग्य हो जाती हैं किन्तु वहां अंडे नहीं देतीं, उन्हें परिपक्व मछलियों की पीयूष ग्रन्थि (पिट्यूटरी ग्लैंड) की सुई द्वारा उद्दीपन प्रदान करके इस अवस्था में ले आया जाता है कि वे बंधे जल में सफलतापूर्वक प्रजनन कर सकें और इस प्रकार समुचित मात्रा में शुद्ध मत्स्य बीज की प्राप्ति सम्भव हो सके। थोड़ा अभ्यास करने पर मत्स्य पालक अपने निजी तालाबों में इस तकनीक को अपना सकते हैं।

कतला, रोहू और नैन प्रजाति की स्वस्थ मछलियों को जिनका भार 4 किलोग्राम तक हो, प्रजनन काल (वर्षाकाल) के 6 माह पूर्व 1000 से 2000 किलोग्राम तक प्रति हेक्टेयर की दर से तालाबों में संचित करना चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप वृद्धि के लिए मछलियों को पर्याप्त प्राकृतिक भोजन प्राप्त हो सकेगा। साथ ही अतिरिक्त कृत्रिम आहार की व्यवस्था करना भी आवश्यक है। कृत्रिम आहार के रूप में मछलियों को प्रतिदिन 1:1 के अनुपात में चावल का कना एवं सरसों की खली का मिश्रण कुल मछलियों के भार का 1 से 2 प्रतिशत की दर से देना चाहिए जिससे वे स्वस्थ रह सकें और परिपक्व हो सकें। समय-समय पर जाल चलाकर प्रजनकों के स्वास्थ्य और उनकी परिपक्वता का निरीक्षण करते रहना चाहिए तथा यह ध्यान रखना चाहिए कि मछलियों को किसी प्रकार की चोट आदि न लगे।

पीयूष ग्रन्थियों का एकत्रीकरण एवं परीक्षण

पीयूष ग्रन्थि मछली के मस्तिष्क के नीचे एक अस्थि आवरण में रहती है और इसे वहां से निकालना पड़ता है। परिपक्व ताजी मेजर कार्प मछलियों की पीयूष ग्रन्थियां माह अप्रैल से जून तक की अवधि में निकाल ली जाती हैं। पीयूष ग्रंथियों को निकालने के पश्चात् इन्हें तत्काल शत-प्रतिशत शुद्ध एल्कोहल या एसीटोन की रंगीन शीशी में रख दिया जाता है तथा उसके उपरान्त समयावधि से दो-तीन बार एल्कोहल या एसीटोन बदल दिया जाता है। ग्रन्थियों को रासायनिक तुला में तौलकर रेफ्रीजरेटर अथवा थरमस फ्लास्क में सुरक्षित रख लेना चाहिए।

पीयूष ग्रन्थि का भार मछली के भार पर ही आधारित रहता है। बड़ी मछली में बड़ी और छोटी में छोटी पीयूष ग्रन्थि का निकलना स्वाभाविक है। अनुभवों के अनुसार रोहू और नैन मछलियों के भार के अनुरूप ग्रन्थि भार निम्न प्रकार है :

रोहू 1 किलोग्राम भार तक 5.1 मिली ग्राम
  1 से 2 किलोग्राम तक 6.6 मिली ग्राम
  2 से 3 किलोग्राम तक 10.3 मिली ग्राम
  3 से 4 किलोग्राम तक 15.2 मिली ग्राम
नैन 0.5 से 1 किलोग्राम तक 6.1 मिली ग्राम
  1 से 1.5 किलोग्राम तक 7.2 मिली ग्राम
  1.5 से 2 किलोग्राम तक 8.0 मिली ग्राम

प्रजनन हेतु प्रजनकों का चयन

वर्षा ऋतु के आगमन पर कार्य मछलियाँ परिपक्वावस्था प्राप्त कर लेती हैं। प्रजनन की सफलता के लिए नर और मादा मछलियों को नवम्बर या दिसम्बर से ही प्रजनक तालाबों में पृथक-पृथक रखा जाना चाहिए। प्रजनन के लिए वर्षा काल में तालाब में जाल चलाकर 2 से 4 किलो की परिपक्व मछलियां निकाली जायं। नर मछली का अंसपक्ष (पेक्टोरल-फिन) परिपक्वता प्राप्त करने पर भीतर की ओर खुरदरा हो जाता है और मादा में चिकना होता है। नर मछली के उदर को थोड़ा सा दबाने पर जननेन्द्रिय छिद्र से दूध-सा द्रव (मिल्ट) निकलने लगता है। मादा मछली का उदर मुलायम, गोलाकार और फूला हुआ होता है। जननेन्द्रिय छिद्र गुलाबी रंग का दिखलाई पड़ता है। इस प्रकार की मछलियों में से एक सेट हेतु एक मादा व दो नरों का चयन किया जाता है।

प्रयोग करते समय प्रजनकों को खींचा जाल (ड्रेगनेट) चलाकर एकत्र करना चाहिए। यदि नर और मादा एक ही तालाब में हों, तो जाल चलाकर एकत्र किए गए प्रजनकों को हैन्डनेट में लेकर शीघ्रता से मछली के अंसपक्ष को उंगलियों से छूने के पश्चात् लिंग निर्धारण करते हुए तुला से तोलना चाहिए। मछलियों का भार लेने व प्रत्येक सेट का विवरण रखने के बाद नर तथा मादा प्रजनकों को तब तक कपड़े के हापे में रखना चाहिए जब तक कि सुई लगाने के लिए पीयूष ग्रन्थियों का सार तैयार न हो जाये।

पीयूष ग्रन्थियों का सार तैयार करना

मछलियों के भार के अनुसार निर्धारित भार की पीयूष ग्रन्थियों को एल्कोहल की शीशी से निकालकर फिल्टर पेपर पर रख लिया जाता है जिससे कि एल्कोहल उड़ जाए। इसके पश्चात् ग्रन्थियों को थोड़ा आसवित जल (डिस्टिल्ड वाटर) मिलाकर मिश्रक (टिशू होमोजिनाइजर) में पीसा जाता है। सार का सान्द्रण 4 मि०ग्रा० भार की ग्रन्थि के लिए 0.1 मि०ली० होना चाहिए। यदि ग्रन्थियां छोटी हों तो सान्द्रण 1 मि०ग्रा० ग्रन्थि भार के लिए 0.1 मि०ली० के हिसाब से भी रखा जाता है। इस प्रकार उचित मात्रा में डिस्टिल्ड वाटर मिलाकर सार तैयार कर लेना चाहिए। तैयार सार को हाथ द्वारा चालित सेन्ट्रीफ्यूगल मशीन में घुमाया जाता है और बाद में तलछट से ऊपरी द्रव को पृथक कर लिया जाता है। इस ऊपरी द्रव को छोटे बीकर या फायल में सुरक्षित रख लिया जाता है जिससे सुई लगाते समय आवश्यकतानुसार इसे सिरिंज में भरा जा सके। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि एक बार में 1 मि०ली० से अधिक तथा 0.1 मि०ली० से कम मात्रा प्रवेश नहीं करानी चाहिए।

सुई लगाने की विधि

सामान्यत: भारतीय मेजर कार्प मछलियों में मादा मछली को दो सुइयां और नर को एक सुई देने के बाद सफलता मिल जाती है। मादा को पहली सुई 2-3 मि०ग्रा० प्रति किलो शरीर भार के अनुसार देकर उसके 4 से 6 घंटे बाद दूसरी सुई 6-8 मि०ग्रा० के हिसाब से दी जाती है। मादा को दूसरी सुई लगाते समय नर मछली को भी 2-3 मि०ग्रा० प्रति किलों शरीर भार के अनुसार सुई देकर प्रजनन के लिए प्रेरित किया जाता है। आम तौर पर सुई पुच्छवृन्त की पेशी में शल्क उठाकर लगायी जाती है। 2 से 3 किलोग्राम की मछली के लिए 22 नम्बर व इससे बड़ी मछलियों के लिए 19 नम्बर की सुई सिरिन्ज के साथ प्रयोग की जाती है।

प्रजनन

सुई लगाने के बाद एक मादा के साथ दो नर कपड़े या नाइलोन के प्रजनन हापा जो 2 X 1 X 1 मीटर आकार का होता है, में छोड़ दिए जाते हैं तथा हापा का ढक्कन बंद कर दिया जाता है। सभी सेटों के लिए हापे लगभग आधा मीटर पानी में डूबे रहने चाहिए। मादा को दूसरी सुई लगाने के 6 घंटे के भीतर सामान्यत: प्रजनन हो जाता है। प्रजनन समाप्त होने पर प्रात: हापे का निरीक्षण करके प्रजनन की सफलता तथा निषेचित अंडों की स्थिति ज्ञात कर ली जाती है। इसके उपरान्त नर और मादा मछलियों को हापे से निकालकर तालाब में वापस छोड़ दिया जाता है। तालाब में छोड़ने से पूर्व प्रजनकों को रोगाणुनाशन के लिए एक प्रतिशत नमक या पोटेशियम परमैगनेट के घोल में नहलाना चाहिए।

प्रजनन के लगभग 6 घंटे के बाद अंडे एकत्र करने योग्य हो जाते हैं। इस समय तक इन अंडों में भ्रूण का हिलना डुलना स्पष्ट दिखलायी पड़ेगा। अंडों की माप एक लीटर के तामचीनी या प्लास्टिक के मग द्वारा कर ली जाती है। एक लीटर में लगभग 30,000 अंडे होते हैं। तत्पश्चात् प्लास्टिक या तामचीनी की बाल्टियों की सहायता से अंडों को हैचिंग हापा में फैला दिया जाता है। हैचिंग हापा दो हापों से मिलकर बना होता है। बाहर वाला हापा महीन मारकीन के कपड़े का बना होता है और इसका आकार 1.8 X 1 X 1 मीटर होता है। भीतरी हापा मच्छरदानी की गोल जाली का बना होता है और इसका आकार 1.5 X 0.8 X 0.5 मीटर होता है। इसमें फलयुक्त तथा निषेचित अंडे फैला दिये जाते हैं। एक हापा में 0.75 लाख से 1 लाख तक अंडे रखना चाहिए। 15 से 16 घंटों में ये अंडे फूट जाते हैं और इनमें से निकले हुए बारीक बच्चे मच्छरदानी की जाली के छेदों में से निकल कर बाहरी हापा में आ जाते हैं। इस अवस्था पर भीतरी हापा निकाल दिया जाता है और अंडों के छिलकों को अलग करके भली प्रकार धोकर सुखा लिया जाता है। इन छोटे मछली के बच्चों को स्पान कहते हैं और इन्हें दो-तीन दिन तक तब तक बाहरी हवा में रहने दिया जाता है जब तक कि इनकी खुराक वाली थैली (योक सैक) खाली न हो जाय। इसके पश्चात् यह बच्चे छोटे-छोटे तालाबों जिन्हें नर्सरी तालाब कहते हैं, में बढ़ने के लिए संचित कर दिए जाते हैं। संचय दर 25 से 50 लाख प्रति हेक्टेयर है। संचयोपरान्त इन्हें भली प्रकार प्राकृतिक एवं कृत्रिम भोजन सुलभ करा कर 15 दिन या एक माह की अवधि में अंगुलिकाओं के रूप में ले आया जाता है। यह अंगुलिकाएं बड़े तालाबों में संचय योग्य हो जाती हैं।

सफल प्रजनन के लिए आवश्यक बातें

  1. स्वस्थ एवं परिपक्व प्रजनकों का चयन।
  2. समुचित मात्रा में पीयूष ग्रन्थियों का संग्रह।
  3. पीयूष ग्रन्थियों की उपयुक्त मात्रा का अनुमान।
  4. प्रजनन अवधि में पानी का उपयुक्त तापक्रम या हल्की वर्षा अथवा ठन्डा बरसाती मौसम।
  5. प्रजनन उन्हीं तालाबों में कराया जाय जिनमें ताजा बरसाती पानी भरा हो जिससे पर्याप्त आक्सीजन मिलती रहे।

उत्प्रेरित प्रजनन हेतु आवश्यक उपकरण

ब्रीडिंग हापा रसायनिक तुला
बांस टिशू होमोजिनाइजर
हैन्ड नेट टेस्ट ट्यूब
स्प्रिंग बैलेन्स बीकर (100 मि०ली० क्षमतावाले)
काटन  
होम्योपैथिक फायल हस्तचालित संट्रीफ्यूगल मशीन
बूचर नाइफ सीरिंज
डिसेक्शन बाक्स सुइयां (19 तथा 22 नम्बर की)
बोन कटर कुशन पैड
एल्कोहल ताम चीनी की बाल्टी
फिल्टर पेपर मग
थर्मस फ्लास्क हैचिंग हापा