उत्तर प्रदेश सरकार
मीठे पानी की पहली प्रजनन

मीठे जल में महाझींगा पालन

मीठे जल का महाझींगा (जायन्ट फ्रेश वाटर प्रान‍) जिसका वैज्ञानिक नाम मैक्रोब्रेकियम रोजनबर्गाई है, जल में नीचे अथवा किनारों पर रेंगने वाला आलसी प्रवृत्ति का सर्वभक्षी जीव है। जलीय कीड़े-मकोड़े, क्रस्टेनिशयन लार्वा तथा छोटे घोंघे आदि इसका प्राकृतिक भोजन हैं और रात्रिचर होने के कारण यह रात्रि काल में अधिक सक्रिय होता है। मीठे जल के महाझींगा में स्वजातिभोजी प्रवृत्ति होती है। खाद्य पदार्थ की उपलब्धता के अभाव अथवा भूख की अवस्था में बड़े झींगे छोटे झींगों को अपना आहार बना लेते हैं।

उत्तर प्रदेश एक अन्तर्स्थलीय राज्य है तथा मीठे पानी के विभिन्न प्रकार के जल संसाधनों से सम्पन्न हैं। अभी तक मुख्य रूप से कार्प मछलियों (भारतीय मेजर कार्प उदाहरणार्थ कतला, रोहू व नैन तथा विदेशी कार्प उदाहरणार्थ सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प व कामन कार्प) के पालन की ओर ध्यान केन्द्रित रहा है परन्तु वर्तमान में मत्स्य विभाग द्वारा झींगा पालन पर भी बल दिया जा रहा है। मत्स्य पालक झींगा पालन के माध्यम से पर्याप्त रूप से लाभान्वित हो सकते हैं। जायन्ट फ्रेश वाटर प्रान यद्यपि भार में 400 ग्राम तक हो जाता है किन्तु लगभग 50 ग्राम का झींगा बाजार में विक्रय योग्य माना गया है। 6-7 माह में तैयार होने वाली यह नगदी फसल है तथा भार के अनुसार झींगों का मूल्य रू० 200/- से रू० 300/- प्रति कि.ग्रा. प्राप्त हो सकता है

झींगा पालन हेतु तालाब :

झींगा पालन के लिए 0.1 से 1.0 हेक्टेयर क्षेत्रफल के आयताकार ऐसे तालाब जिनमें पानी भरने व बाहर निकालने की उचित व्यवस्था हो, उपयुक्त होते हैं ताकि पानी बाहर निकालकर झींगों को आसानी से पकड़ा जा सके।

तालाब की मिट्टी :

तालाब की मिट्टी की पी-एच 6.5-7.5, रेत 40 प्रतिशत, क्ले की मात्रा 40 प्रतिशत व सिल्ट 20 प्रतिशत उपयुक्त होती है।

तालाब का जल :

तालाबके जल का रंग हल्का हरा अथवा भूरा तथा गहराई 1.0 मीटर होनी चाहिए। पारदर्शिता 35-40 सें.मी., पी-एच 7.5-/.5, जलीय तापमान 18.34 डि.सें. (28-32 डि.सें. अधिक उपयुक्त), घुलित आक्सीजन 5 मि.ग्रा./ली. तथा कठोरता 50-150 मि.ग्रा./ली. उपयुक्त होती है। वांछित घुलित आक्सीजन के लिये तालाब में ताजा पानी मिलाया जाना चाहिये अथवा एरेटर की व्यवस्था की जानी चाहिये। मत्स्य पालक अपने तालब की मिट्टी व पानी का परीक्षण मत्स्य विभाग की प्रयोगशालाओं द्वारा करा सकते हैं।

चूने का प्रयोग व उर्वरकीकरण :

तालाब में चानी भरने के बाद पी-एच को दृष्टिगत रखते हुए 250-500 कि.ग्रा./हे. की दर से चूने का प्रयोग एवं मिट्टी में उपलब्ध नाइट्रोजन व फास्फोरस को देखते हुए क्रमश: 250 कि.ग्रा./हे. यूरिया व 200 कि.ग्रा./हे. सिंगिल सुपर फास्फेट का प्रयोग विभागीय प्रयोगशालाओं की संस्तुतियों के अनुसार किश्तों में करना चाहिए ताकि तालाब में छोटे-छोटे कीड़े उत्पन्न हो सकें और प्राकृतिक आहार के रूप में उनका भक्षण झींगों द्वारा किया जा सके।

झींगा बीज संचय

1.0 हे. जलक्षेत्र के ऐसे तालाब जिसमें पानी बदलने और वायुकरण की सुविधा न हो, में 20,000-35,000 तथा ऐसे तालाब जिसमें जल बदलाव, वायुकरण आदि सुविधायें उपलब्ध हों, में 70,000-80,000 तक झींगा बीज संचय किया जा सकता है।

झींगा बीज की उपलब्धता

जायन्ट फ्रेश वाटन प्रान के प्रजनन के लिए खारे जल की आवश्यकता होती। झींगा बीज उत्तर प्रदेश में तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उड़ीस आदि प्रदेशों से मंगाया जा सकता है। इसके लिए मत्स्य पालक उत्तर प्रदेश मत्स्य विभाग से सम्पर्क कर सकते हैं।

उत्तर प्रदेश की जलवायु को देखते हुए प्रदेश में मार्च/अप्रैल में झींगा बीज संचित किया जाना तथा नवम्बर माह तक हारवेस्टिंग किया जाना उपयुक्त व लाभकारी सिद्ध हो सकता है।

झींगा हेतु कृत्रिम आहार

झींगा हेतु कृत्रिम आहार में 28-30 प्रतिशत प्रोटीन (50 प्रतिशत जन्तु और 50 प्रतिशत वनस्पति साधन में) उपलब्ध होनी चाहिए। आहार ऐसा दिया जाना चाहिए जो झींगा के लिए संतुलित भोजन हो, पानी में स्थिर रहे तथा जल को कम प्रदूषित करे।

उत्पादन व विपणन :

मादा झींगों की अपेक्षा नद झींगे आकार में बड़े होते हैं। सभी झींगे तालाब को खाली करके निकाले जा सकते हैं। 6-7 माह की पालन अवधि में लगभग 1000 कि.ग्रा./हे. झींगा उत्पादन हो सकता है जिसे यदि रू० 250/- प्रति कि.ग्रा. की दर से बेचा जाय तो रू० 2,50,000/- की आय सम्भव है। तालाब प्रबन्ध व्यवस्था, उर्वरक, झींगा बीज, कृत्रिम आहार, विटामिन, मिनरल एवं दवाईयां, अन्य विविध व्यय आदि पर लगभग रू० 1,25,000/- का व्यय सम्भावित है तथा इस प्रकार 1.0 हे. के जलक्षेत्र से लगभग रू० 1,25,000/- का शुद्ध लाभ अर्जित किया जा सकता है। स्पष्ट है कि झींगा पालन में लाभ की काफी सम्भावनायें हैं।

मछली की अपेक्षा झींगा शीघ्र खराब होकर दुर्गन्ध उत्पन्न करता है। इसे पकड़ने के तुरन्त बाद बर्फ में रखा जाय तथा निर्यातकों अथवा शहरों में बड़े होटलों से सम्पर्क स्थापित करते हुए झींगा की बिक्री की जाय ताकि उचित मूल्य मिल सके।

अतिरिक्त जानकारी के लिए मत्स्य पालक कृपया जनपद स्तर पर

स्थापित मत्स्य पालक विकास अभिकरण के कार्यालय में सम्पर्क करें।