उत्तर प्रदेश सरकार
प्रशिक्षण और प्रसार के मैनुअल 2

5. तालाब प्रबंध व्यवस्था :-

मत्स्य पालन प्रारम्भ करने से पूर्व यह अत्यधिक आवश्यक है कि मछली का बीज डालने के लिए तालब पूर्णरूप से उपयुक्त हो।

5.1 अनावश्यक जलीय पौधों का उन्मूलन :-

तालाब में आवश्यकता से अधिक जलीय पौधों का होना मछली की अच्छी उपज के लिए हानिकारक है। यह पौधे पानी का बहुत बड़ा भाग घेरे रहते हैं जिससे मछली के घूमने-फिरने में असुविधा होती है। साथ ही यह सूर्य की किरणों को पानी के अंदर पहुंचने में भी बाधा उत्पन्न करते हैं। परिणामस्वरूप मछली का प्राकृतिक भोजन उत्पन्न होना रूक जाता है और प्राकृतिक भोजन के अभाव में मछली की वृद्धि पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त यह पौधे मिट्टी में पाये जाने वाले रासायनिक पदार्थों का प्रचूषण करके अपनी बढ़ोत्तरी करते हैं और पानी की पौष्टिकता कम हो जाती है। मछली पकड़ने के लिए यदि जाल चलाया जाय तब भी यह पौधे रूकावट डालते हैं। समान्यत: तालाबों में जलीय पौधे तीन प्रकार के होते हैं- एक पानी की सतह वाले जैसे जलकुम्भी, लेमना आदि, दसूरे जड़ जमाने वाले जैसे कमल इत्यादि और तीसरे जल में डूबे रहने वाले जैसे हाइड्रिला, नाजाज आदि। यदि तालाब में जलीय पौधों की मात्रा कम हो तो इन्हें जाल चलाकर या श्रमिक लगाकर जड़ से उखाड़कर निकाला जा सकता है। अधिक जलीय वनस्पति होने की दशा में रसायनों का प्रयोग जैसे 2-4 डी सोडियम लवण, टेफीसाइड, हेक्सामार तथा फरनेक्सान 8-10 कि०ग्रा० प्रति हे० जलक्षेत्र में प्रयोग करने से जल कुम्भी, कमल आदि नष्ट हो जाते हैं। रसायनों के प्रयोग के समय विशेष जानकारी मत्स्य विभाग के कार्यालयों से प्राप्त की जानी चाहिए। कुछ जलमग्न पौधे ग्रास कार्प मछली का प्रिय भोजन होते हैं अत: इनकी रोकथाम तालाब में ग्रास कार्प मछली पालकर की जा सकती है। उपयुक्त यही है कि अनावश्यक पौधों का उन्मूलन मानव-शक्ति से ही सुनिश्चित किया जाय।

5.2 अवांछनीय मछलियों की सफाई

पुराने तालाबों में बहुत से अनावश्यक जन्तु जैसे कछुआ, मेढक, केकड़े और मछलियाँ जैसे सिंधरी, पुठिया, चेलवा आदि एवं भक्षक मछलियाँ उदाहरणार्थ पढ़िन, टैंगन, सौल, गिरई, सिंधी, मांगुर आदि पायी जाती हैं जोकि तालाब में उपलब्ध भोज्य पदार्थों को अपने भोजन के रूप में ग्रहण करती हैं। मांसाहारी मछलियां कार्प मछलियों के बच्चों को खा जाती हैं जिससे मत्स्य पालन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अत: इनकी सफाई नितान्त आवश्यक है। अवांछनीय मछलियों का निष्कासन बार-बार जाल चलाकर या पानी निकाल कर अथवा महुआ की खली के प्रयोग द्वारा किया जा सकता है। महुए की खली का प्रयोग एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के एक मीटर पानी की गहराई वाले तालाब में 25 कुंटल की दर से किया जाना चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप 6-8 घंटों में सारी मछलियाँ मर कर ऊपर आ जाती हैं जिन्हें जाल चलाकर एकत्र करके बाजार में बेचा जा सकता है। महुए की खली का प्रयोग तालाब के लिए दोहरा प्रभाव डालता है। विष के अलावा 15-20 दिन बाद यह खाद का भी कार्य करती है जिससे मछली के प्राकृतिक भोजन का उत्पादन होता है।

5.3 तालाब का जल :-

तालाब का जल हल्का हरा या हल्का भूरा होना चाहिए। पानी की पी-एच 7.5-8.5, घुलित ऑक्सीजन 5.0 मि.ग्रा०/ली०, स्वतंत्र कार्बन डाईआक्साइड 0 से 0.5 मि.ग्रा./ली०, सम्पूर्ण क्षारीयता 200 मि.ग्रा./ली०, क्लोराइड्स 50 मि.ग्रा./ली०, कुल कठोरता 150 मि.ग्रा./ली०, तक होनी चाहिए। तालाब की मिट्टी पानी की जांच मत्स्य विभाग की प्रयोगशालाओं द्वारा की जाती है तथा आधुनिक विधि से मत्स्य पालन करने हेतु मत्स्य पालकों को संस्तुतियों दी जाती हैं।

5.4 जलीय उत्पादकता हेतु चूने का प्रयोग :-

पानी का हल्का क्षारीय होना मत्स्य पालन के लिए लाभप्रद है। पानी अम्लीय अथवा अधिक क्षारीय नहीं होना चाहिए। चूना जल की क्षारीयता बढ़ाता है अथवा जल की अम्लीयता व क्षारीयता को संतुलित करता है। इसके अतिरिक्त चूना मछलियों को विभिन्न परोपजीवियों के प्रभाव से मुक्त रखता है और तालाब का पानी उपयुक्त बनाता है। एक हेक्टेयर के तालब में 250 कि०ग्रा० चूने का प्रयोग मत्स्य बीज संचय से एक माह पूर्व किया जाना चाहिए।

5.5 गोबर की खाद का प्रयोग :-

तालाब की तैयार में गोबर की खाद की महत्वपूर्ण भूमिका है। इससे मछली का प्राकृति भोजन उत्पन्न होता है। गोबर की खाद, मत्स्य बीज संचय से 15-20 दिन पूर्व सामान्यतया 10-20 टन प्रति हे० प्रतिवर्ष 10 समान मासिक किश्तों में प्रयोग की जानी चाहिए। यदि तालाब की तैयारी में अवांछनीय मछलियों के निष्कासन के लिए महुआ की खली डाली गयी हो तो गोबर की खाद की पहली किश्त डालने की आवश्यकता नहीं है।

5.6 रासयनिक खादों का प्रयोग :-

सामान्यत: रासायनिक खादों में यूरिया 200 किलोग्राम, सिंगिल सुपर फास्फेट 250 कि०ग्रा० व म्यूरेट आफ पोटाश 40 कि०ग्रा० अर्थात मिश्रण 490 कि०ग्रा० प्रति हे० प्रति वर्ष 10 समान मासिक किश्तों में प्रयोग किया जाना चाहिए। इस प्रकार 49 कि०ग्रा० प्रति हे० प्रतिमाह रासायनिक खादों के मिश्रण को गोबर की खाद के प्रयोग के 15 दिन बाद तालाब में डाला जाना चाहिए। यदि तालाब के पानी का रंग गहरा हरा या गहरा नीला हो जाये तो उर्वरकों का प्रयोग तब तक बन्द कर देना चाहिए जब तका पानी का रंग उचित अवस्था में न आ जाये।

6. मत्स्य बीज संचय व अंगुलिकाओं की देखभाल :-

तालाब में ऐसी मत्स्य प्रजातियों का पालन किया जाना चाहिए जो एक पर्यावरण में साथ-साथ रह कर एक दूसरे को क्षति न पहुंचाते हुए प्रत्येक सतह पर उपलब्ध भोजन का उपयोग करते हुए तीव्रगति से बढ़ने वाली हों ताकि एक सीमित जलक्षेत्र से अधिक से अधिक मत्स्य उत्पादन सुनिश्चित हो सके। भारतीय मेजर कार्प मछलियों में कतला, रोहू, नैन तथा विदेशी कार्प मछलियों में सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प व कामन कार्प का मिश्रित पालन काफी लाभकारी होता है। तालाब में मत्स्य बीज संचय से पूर्व यह विशेष ध्यान देने योग्य है कि तैयारी पूर्ण हो गयी है और जैविक उत्पादन हो चुका है। मछली का प्राकृतिक भोजन जिसे प्लांक्टान कहते हैं पर्याप्त मात्र में उपलब्ध होना चाहिए। तालाब के 50 ली० पानी में एक मि०ली० प्लांक्टान की उपलब्धता इस बात का द्योतक है कि मत्स्य बीज संचय किया जा सकता है। एक हे० जल क्षेत्र में 50 मि०मी० आकार में कम का 10,000 मत्स्य बीज तथा 50 मि०मी० से अधिक आकार की 5000 अंगुलिकाएं संचित की जानी चाहिए। यदि 6 प्रकार की देशी व विदेशी कार्प मछलियों का मिश्रित पालन किया जा रहा हो तो कतला 20%, सिल्वर कार्प 10%, रोहू 30%, ग्रास कार्प 10%, नैन 15%, व कामन कार्प 15%, का अनुपात उपयुक्त होता है। यदि सिल्वर कार्प व ग्रास कार्प मछलियों का पालन नहीं किया जा रहा है और 4 प्रकार की मछलियां पाली जा रही हैं तो संचय अनुपात कतला 40%, रोहू 30%, नैन 15% व कामन कार्प 15%, होना लाभकारी होता है। यदि केवल भारतीय मेजर कार्प मछलियों का ही पालन किया जा रहा हो तो कतला 40%, रोहू 30%, नैन 30%, का अनुपात होना चाहिए। कामन कार्प मछली कार्प मछली का बीज मार्च, अप्रैल व मई में तथा अन्य कार्प मछलियों का बीज जुलाई, अगस्त, सितम्बर में प्राप्त किया जा सकता है।

7. पूरक आहार

मछली की अधिक पैदावार के लिए यह आवश्यक है कि पूरक आहार दिया जाय। आहार ऐसा होना चाहिए जो कि प्राकृतिक आहार की भांति पोषक तत्वों से परिपूर्ण हो। साधारणत: प्रोटीनयुक्त कम खर्चीले पूरक आहारों का उपयोग किया जाना चाहिए। मूंगफली, सरसों, नारियल या तिल की महीन पिसी हुई खली और चावल का कना या गेहूं का चोकर बराबर मात्रा में मिलाकर मछलियों के कुल भार का 1-2 प्रतिशत तक प्रतिदिन दिया जाना चाहिए। मछलियों के औसत वजन का अनुमान 15-15 दिन बाद जाल चलवाकर कुछ मछलियों को तौलकर किया जा सकता है। यदि ग्रास कार्प मछली का पालन किया जा रहा हो तो जलीय वनस्पति जैसे लेमना, हाइड्रिला, नाजाज, सिरेटोफाइलम आदि व स्थलीय वनस्पति जैसे नैपियर, वरसीम व मक्का के पत्ते इत्यादि जितना भी वह खा सके, प्रतिदिन देना चाहिए। पूरक आहार निश्चित समय व स्थान पर दिया जाय तथा जब पहले दिया गया आहार मछलियों द्वारा खा लिया गया हो तब पुन: पूरक आहार दें। उपयोग के अनुसार मात्रा घटाई-बढ़ाई जा सकती है। पूरक आहार बांस द्वारा लटकाये गये थालों या ट्रे में रखकर दिया जा सकता है। यदि पूरक आहार के प्रयोग स्वरूप पानी की सतह पर काई की परत उत्पन्न हो जाय तो आहार का प्रयोग कुछ समय के लिए रोक देना चाहिए क्योंकि तालाब के पानी में घुलित आक्सीजन में कमी व मछलियों के मरने की सम्भावना हो सकती है।

8. विभिन्न माहों में मत्स्य पालकों द्वारा सम्पादित किये जाने वाले कार्य :-

8.1 प्रथम त्रैमास, अप्रैल, मई, जून

  1. उपयुक्त तालाब का चुनाव।
  2. नये तालाब के निर्माण हेतु उपयुक्त स्थल का चयन।
  3. मिट्टी-पानी की जांच।
  4. तालाब सुधार/निर्माण हेतु मत्स्य पालक विकास अभिकरणों के माध्यम से तकनीकी व आर्थिक सहयोग लेते हुए तालाब सुधार/निर्माण कार्य की पूर्णता।
  5. अवांछनीय जलीय वनस्पतियों की सफाई।
  6. एक मीटर पानी की गइराई वाले एक हेक्टेयर के तालब में 25 कुंटल महुआ की खली के प्रयोग के द्वारा अथवा बार-बार जाल चलाकर अवांछनीय मछलियों की निकासी।
  7. उर्वरा शक्ति की वृद्धि हेतु 250 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेयर चूना तथा सामान्यत: 10-20 कुंटल/हे०/माह गोबर की खाद का प्रयोग।

8.2 द्वितीय त्रैमास, जुलाई, अगस्त, सितम्बर

  1. मत्स्य बीज संचय के पूर्व पानी की जांच (पी-एच 7.5-8.0 व घुलित आक्सीजन 5 मि०ग्रा० प्रति लीटर होनी चाहिए)।
  2. तालाब में 25-50 मि०मी० आकार के 10,000 मत्स्य बीज का संचय।
  3. पानी में उपलब्ध प्राकृतिक भोजन की जांच।
  4. गोबर की खाद के प्रयोग के 15 दिन बाद सामान्यत: 49 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेयर प्रति माह की दर से एन०पी०के० खादों (यूरिया 20 कि०ग्रा०, सिंगिलसुपर फास्फेट 25 कि०ग्रा०, म्येरेट आफ पोटाश 4 कि०ग्रा०) का प्रयोग।
  5. एन०पी०के० खादों के प्रयोग के 15 दिन बाद 10-20 कुंटल/हे०/माह गोबर की खाद का प्रयोग।
  6. मत्स्य अंगुलिकाओं के भार का 1-2 प्रतिशत की दर से प्रतिदिन पूरक आहार का प्रयोग।

8.3 तृतीय त्रैमास, अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर

  1. मछलियों की वृद्धि दर की जांच।
  2. मत्स्य रोग की रोकथाम हेतु सीफैक्स का प्रयोग अथवा रोग ग्रस्त मछलियों को पोटेशियम परमैगनेट या नमक के घोल में डालकर पुन: तालाब में छोड़ना।
  3. पानी में प्राकृतिक भोजन की जांच।
  4.  
  5. पूरक आहार दिया जाना।
  6. ग्रास कार्प मछली के लिए जलीय वनस्पतियां (लेमना, हाईड्रिला, नाजाज, सिरेटोफाइलम आदि) खिलाना।
  7. उर्वरकों का प्रयोग।

8.4 चतुर्थ त्रैमास, जनवरी, फरवरी, मार्च

  1. बड़ी मछलियों की निकासी एवं विक्रय।
  2. बैंक की ऋण किश्त की अदायगी।
  3. एक हे० के तालाब में कामन कार्प मछली के लगभग 1500 बीज का संचय।
  4. पूरक आहार दिया जाना।
  5. उर्वरकों का प्रयोग।

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