उत्तर प्रदेश सरकार
प्रशिक्षण और प्रसार पर मैनुअल

1. मछली का महत्व :-

भारतीय इतिहास में दर्शन और भोजन दोनों दृष्टि से शुभ और श्रेष्ठ मानी जाने वाली मछली जली पर्यावरण पर आश्रित है तथा जलीय पर्यावरण को संतुलित रखने में मछली की काफी महत्वपूर्ण भूमिका है। यह कथन अपने में पर्याप्त बल रखता है कि जिस पानी में मछली नहीं है तो निश्चित ही उस पानी की जल-जैविक स्थिति सामान्य नहीं है। वैज्ञानिकों द्वारा मदली को बायोइंडीकेटर माना गया है। विभिन्न जलस्रोतों में चाहे तीव्र अथवा मन्द गति से प्रवाहित होने वाली नदियां हों, चाहे प्राकृतिक झीलें, तालाब अथवा मानव-निर्मित बड़े या मध्यम आकार के जलाशय, सभी के पर्यावरण का यदि सूक्ष्म अध्ययन किया जाय तो निष्कर्ष निकलता है कि पानी और मदली दोनों एक दूसरे से काफी जुड़े हुए हैं। पर्यावरण को संतुलित रखने में मछली की विशेष उपयोगिता है।

शरीर के पोषण तथा निर्माण में संतुलित आहार की आवश्यकता होती है। संतुलित आहार की पूर्ति विभिन्न खाद्य पदार्थों को उचित मात्रा में मिलाकर की जा सकती है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, खनिज लवण आदि की आवश्यकता होती है जो विभिन्न भोज्य पदाथों में भिन्न-भिन्न अनुपातों में पाये जाते हैं। स्वस्थ शरीर के निर्माण हेतु प्रोटीन की अधिक मात्रा होनी चाहिए क्योंकि यह मांस पेशियों, तंतुओं आदि की संरचना करती है। विटामिन, खनिज, लवण आदि शरीर की मुख्य क्रियाओं को संतुलित करते हैं। मछली, मांस, अंडे, दूध, दालों आदि का उपयोग संतुलित आहार में प्रमुख रूप से किया जा सकता हे। मछलियों में लगभग 70 से 80 प्रतिशत पानी, 12 से 22 प्रतिशत प्रोटीन, 1 से 3.5 प्रतिशत खनिज पदार्थ एवं 0.5 से 20 प्रतिशत चर्बी पायी जाती है। कैल्शियम, पोटेशियम, फास्फोरस, लोहा, सल्फर, मैग्नीशियम, तांबा, जस्ता, मैग्नीज, आयोडीन आदि खनिज पदार्थ मछलियों में उपलब्ध होते हैं जिनके फलस्वरूप मछली का आहार काफी पौष्टिक माना गया है। इनके अतिरिक्त राइबोफ्लेविन, नियासिन, पेन्टोथेनिक एसिड, बायोटीन, थाइमिन, बिटामिन बी 12, बी 6, डी आदि भी पाये जाते हैं जोकि स्वास्थ्य के लिए काफी लाभकारी होते हैं। विश्व के सभी देशों में मछली के विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर उपयोग में लाये जाते हैं। मछली के मांस की उपयोगिता सर्वत्र देखी जा सकती है। मीठे पानी की मछली में वसा बहुत कम पायी जाती है व इसमें शीघ्र पचने वाली प्रोटीन होती है। सम्पूर्ण विश्व में मछली की लगभग 25,476 प्रजातियाँ व भारत वर्ष में 2534 प्रजातियां पाये जाने की जानकारी है। जिसमें भारतीय मूल की 2243 एवं विदेशी मूल की 291 प्रजातियां हैं। स्वभाव के अनुसार मीठे जल की 765, नमकीन जल की 113 एवं समुद्री जल की 1365 मत्स्य प्रजातियां भारत में उपलब्ध हैं। गंगा नदी प्रणाली जो कि हमारे देश की सबसे बड़ी नदी प्रणाली है, में लगभग 375 मत्स्य प्रजातियां उपलब्ध हैं। वैज्ञानिकों द्वारा उत्तर प्रदेश व बिहार में 111 मत्स्य प्रजातियों की उपलब्धता बतायी गयी है।

मछली एक उच्च कोटि का खाद्य पदार्थ है। इसके उत्पादन में वृद्धि किये जाने हेतु उत्तर प्रदेश मत्स्य विभाग निरन्तर प्रयत्नशील है। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में विभिन्न प्रकार के तालाब, पोखरे और जल प्रणालियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं जिनमें वैज्ञानिक रूप से मत्स्य पालन अपना कर मत्स्य उत्पादन में वृद्धि करके लोगों को पोषक और संतुलित आहार उपलब्ध कराया जा सकता है।

2. मत्स्य व्यवसाय - एक श्रम प्रधान व्यवसाय :-

मत्स्य व्यवसाय एक श्रम प्रधान व्यवसाय है। इसमें कम पूँजी लगाते हुए अधिकतम लाभ अर्जित किये जाने की काफी संभावनायें हैं। जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि के परिणाम-स्वरूप रोजी रोटी की समस्य के समाधान के लिए यह अत्यधिक आवश्यक है कि आज के प्रगतिशील युग में ऐसे कार्यक्रम अपनाये जाएं जिनके माध्यम से खाद्य पदार्थों के उत्पादन के साथ-साथ भूमिहीनों, निर्धनों, बेरोजगारों, मछुआरों आदि के लिए रोजगार के साधनों का सृजन भी हो सके। उत्तर प्रदेश एक अंतर्स्थलीय प्रदेश है जहां मत्स्य पालन और मत्स्य उत्पादन की दृष्टि से सुदूरवर्ती ग्रामीण अंचलों में तालाब व पोखरों के रूप में तमाम मूल्यवान जल सम्पदा उपलब्ध है। मछली पालन का व्यवसाय निश्चित ही रोजी-रोटी का एक उत्तम साधन है तथा इस कार्यक्रम के माध्यम से ग्रामीण अंचल में अनुपयोगी सिथति में पड़े हुए तालाबों की उपयोगिता सुनिश्चित करते हुए उत्तम प्रोटीन युक्त पौष्टिक खाद्य पदार्थ के उत्पादन के साथ-साथ बेराजगारों और दुर्बल वर्ग के व्यक्तियों के लिए अतिरिक्त आय भी सम्भव है। मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश के सभी जनपदों में मत्स्य पालक विकास अभिकरण स्थापित किये गये हैं जिनका ग्रामीण समृद्धि और सर्वांगीण विकास में विशेष योगदान है। बेरोजगारों के लिए मत्स्य पालन हेतु तालाब सुधार, नये तालाब के निर्माण व उत्पादन निवेशों के लिए बैंक ऋण तथा अनुदान, मछली के बीज की आपूर्ति, प्रशिक्षण आदि सुविधाएं सुलभ करायी जाती हैं ताकि उन्हें रोजी-रोटी प्राप्त हो सके।

3. मत्स्य पालन हेतु उपयुक्त तालाब का चयन/निर्माण :-

जिस प्रकार कृषि के लिए भूमि आवश्यक है उस प्रकार मत्स्य पालन के लिए तालाब की आवश्यकता होती है। ग्रामीण अंचलों में विभिन्न आकार-प्रकार के तालाब व पोखरें पर्याप्त संख्या में उपलब्ध होते हैं जोकि निजी, संस्थागत अथवा गांव सभाओं की सम्पत्ति होते हैं। इस प्रकार के जल संसाधन या तो निष्प्रयोज्य पड़े रहते हैं अथवा उनका उपयोग मिट्टी निकालने, सिंघाड़े की खेती करने, मवेशियों को पानी पिलाने, समीपर्ती कृषि योग्य भूमि को सींचने आदि के लिए किया जाता है।

मत्स्य पालन हेतु 0.2 हेक्टेयर से 5.0 हेक्टेयर तक के ऐसे तालाबों का चयन किया जाना चाहिए जिनमें वर्ष भर अथवा 8-9 माह पानी भरा रहे। तालाबों को सदाबहार रखने के लिए जल की आपूर्ति का साधन होना चाहिए। तालाब में वर्ष भर एक से दो मीटर पानी अवश्य बना रहे। तालाब ऐसे क्षेत्रों में चुने जायें जो बाढ़ से प्रभावित न होते हों तथा तालाब तक आसानी से पहुंचा जा सके। बन्धों का कटा फटा व ऊँचा नीचा होना, तल का असमान होना, पानी आने-जाने के रास्तों का न होना, दूसरे क्षेत्रों से अधिक पानी आने-जाने की संभावनाओं का बना रहना आदि कमियाँ स्वाभाविक रूप से तालाब में पायी जाती हैं जिन्हें सुधार कर दूर किया जा सकता है। तालाब को उचित आकार-प्रकार देने के लिए यदि कहीं पर टीले आदि हों तो उनकी मिट्टी निकाल कर बन्धों पर डाल देनी चाहिए। कम गहराई वाले स्थान से मिट्टी निकालकर गहराई एक समान की जा सकती है। तालाब के बंधे बाढ़ स्तर से ऊँचे रखने चाहिए। पानी के आने व निकास के रास्ते में जाली की व्यवस्था आवश्यक है ताकि पाली जाने वाली मछलियां बाहर न जा सकें और अवांछनीय मछलियां तालाब में न आ सकें। तालाब का सुधार कार्य माह अप्रैल व मई तक अवश्य करा लेना चाहिए जिससे मत्स्य पालन करने हेतु समय मिल सके।

नये तालाब के निर्माण हेतु उपयुक्त स्थल का चयन विशेष रूप से आवश्यक है। तालाब निर्माण के लिए मिट्टी की जल धारण क्षमता व उर्वरकता को चयन का आधार माना जाना चाहिए। ऊसर व बंजर भूमि पर तालाब नहीं बनाना चाहिए। जिस मिट्टी में अम्लीयता व क्षारीयता अधिक हो उस पर भी तालाब निर्मित कराया जाना उचित नहीं होता है। इसके अतिरिक्त बलुई मिट्टी वाली भूमि में भी तालाब का निर्माण उचित नहीं होता है क्योंकि बलुई मिट्टी वाले तालाबों मे पानी नहीं रूक पाता है। चिकनी मिट्टी वाली भूमि में तालाब का निर्माण सर्वथा उपयुक्त होता है। इस मिट्टी में जलधारण क्षमता अधिक होती है। मिट्टी की पी-एच. 6.5-8.0, आर्गेनिक कार्बन 1% तथा मिट्टी में रेत 40% सिल्ट 30% व क्ले 30% होना चाहिए। तालाब निर्माण के पूर्व मृदा परीक्षण मत्स्य विभाग की प्रयोगशालाओं अथवा अन्य प्रयोगशालाओं से अवश्य करा लेना चाहिए। तालाब के बंधे में दोनों ओर के ढलानों में आधार व ऊँचाई का अनुपात साधारणतया 2:1 या 1:5:1 होना उपयुक्त है। बंध की ऊँचाई आरम्भ से ही वांछित ऊँचाई से अधिक रखनी चाहिए ताकि मिट्टी पीटने, अपने भार तथा वर्षा के कारण कुछ वर्षों तक बैठती रहे। बंध का कटना वनस्पतियों व घासों को लगाकर रोका जा सकता है। इसके लिए केले, पपीते आदि के पेड़ बंध के बाहरी ढलान पर लगाये जा सकते हैं। नये तालाब का निर्माण एक महत्वपूर्ण कार्य है तथा इस संबंध में मत्स्य विभाग के अधिकारियों का परामर्श लिया जाना चाहिए।

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